Sunday, May 21, 2017

Bharti Ji

कुछ हम क़दम बढ़ाते , कुछ तुम क़रीब आते ,
फ़ासले ज़्यादा ना थे, नीयत से ही मिट जाते !
     Bharti Chopra Ji

Sunday, May 14, 2017

Kapil's Story : Ranjish hi Sahi , Dil hi Dukhane ke liye Aaa

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Kapil's Story : Ranjish hi Sahi , Dil hi Dukhane ke liye Aaa ,
रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिऐ आ

राजन तुम मुझसे सत्रह साल छोटे हो , जब आखिर बार तुम आये तो तुम्हे वो बात नही कहनी चाहिये थी , माँ ने मामा को गिला शिक़वे के लहज़े में कहा , अभी मामा जी को आये पाँच मिनट भी नही हुए थे , सिर्फ पानी ही उनकी ख़ातिर में आया था , मामा जी ने माँ के लहज़े मे झुपी नाराज़गी को तुरंत भाँपते हुए पूछा , कौन सी बात बहनजी ? , मै कुछ समझा नही , वो हैरान परेशान , तब तक माँ भी भूल गयी कौन सी बात , बोली खैर छोड़ो उस बात को , यह बताओ , तुम इतने इतने दिन हो जाते है मिलने भी नही आते ,  मामा जी बोले बहनजी अभी पिछले महीने ही तो आया था , राजन अब तुम भी मुझे दिन गिना रहे हो , यह अब तक का तीसरा गिला शिकवा था माँ का मामा जी के प्रति , जिनका आगमन हुए अभी सिर्फ दस मिनट ही हुऐ थे ।

मुझे बहन-भाई के इस बातचीत का कोई सिर पैर नज़र नही आ रहा था , मैने बीच में टपकते हुऐ पूछा मामा जी आप क्या लेंगे ? मामाजी जवाब देते इससे पहले ही माँ  मुझसे बोली कामिनी को बोलो , ठंडा आम का पन्ना जो मैने बनवाया है ख़ास राजन के लिये , वो लाये , और कुछ फल कटवाओ , कितनी गर्मी में राजन आया है , उसके बाद , खाना भी , आज सिर्फ राजन की पसंद का बनवाया है , दही भल्ले इत्यादि , अब हैरान परेशान होने की मेरी बारी थी , कि माँ अपने भाई को दुलार कर रही है या गुस्सा , मामाजी परेशान हो चुके थे , उनको कुछ समझ नही आ रहा था कि उनसे कौन सी बात , कब गलत हो गयी , अपनी बड़ी बहन के प्रति | मुझको बोले कपिल , मैने बहनजी को पिछली शाम ही फ़ोन करके बताया था कि कल इतवार है , मै ग्यारह बजे आपसे मिलने नोएडा आऊंगा , उन्होंने कहा , लंच साथ करेंगे , बहुत ही ख़ुश थी फ़ोन पर | मुझे याद ही नही आ रहा कि मुझसे कोई सी बात गलत हो गयी , जिसका ज़िक्र बहनजी कर रही है , मामाजी के दबे कुचले लहज़े मे एक मासूम सी शर्मिन्दगी लिए माफ़ी की गुज़ारिश थी , जो दिल को दहलाने की कैफ़ियत रखती थी , मैने उनके दिल का मर्म समझते हुऐ कहा , मामाजी , ऐसी कोई बात नही है , तब तक माहौल पटरी से उतर चुका था , मामाजी का मूड ख़राब सा हो गया था , अपने भाई का उतरा चेहरा देख , माँ तुरंत बड़ी बहन की मुद्रा में बोली , राजन , आम का पन्ना लो इत्यादि इत्यादि , सब बेअसर,  उसके बाद मामाजी एक डेढ घंट बामुश्किल गुजारा , और भारी मन से चले गये ।

पिछले एक महीने मे लगभग तीसरी चौथी बार , यही नाटकीय परिस्थिति , क़िरदार बदल बदल के हुई , रीता दीदी , सुजाता दीदी , कांता मौसी , और आज राजन मामाजी , सब आये बढ़िया मूड़ में माँ से मिलने , सबकी आने की इत्तला पहले से थी , उनके आते ही माँ द्वारा उनके प्रति शिकायतों का अंबार , इसके बाद उनके पसंदीदा व्यंजओ से सजी टेबल और उनका भारी मन से अपने घर के लिये प्रस्थान , और उसी शाम उसी क़िरदार से फ़ोन पर लंबी बात जिसमे माँ का पूरी तरह वात्सल्यता से परिपूर्ण , आशीर्वादों से भरा और उस क़िरदार की तारीफों का तांता , घण्टों चलते फ़ोन से उस दिन का अंत , मेरे अनुमान अनुसार उस क़िरदार का वो सारा दिन बर्बाद , ना तो वो माँ को कुछ कह सके , ना कुछ कर सके , इधर माँ को उस शाम को बैचैनी की , मैंने उस क़िरदार को क्यों इतनी बाद सुनाई ।

बकौल फैज़ अहमद फैज़ ,
’वो बात सारे फ़साने में जिस का ज़िक्र न था ,
वो बात उन को बहुत ना-गवार गुज़री है ,

घर का सारा माहौल बहुत ही बोझिल था , एक अजीब सी किचकीची फिज़ा मे थी , माँ तो कभी भी ऐसी नही थी , यह सारी समस्या लगभग पिछले एक महीने के करीब मे उजागर हुई है , क्या कारण है कोई पता नही , अभी हाल ही मे हुई सारी मेडिकल रिपोर्टो में सभी कुछ ठीक आया है , उसके बावजूद सब गड़बड़ थी ।

पच्चीस तीस दिन और गुजरे होंगे , शाम ओखला फैक्ट्री से नोएडा घर आ रहा था , जाने क्यों इतना ट्रैफिक जाम लगा था , कार का सीडी प्लेयर ऑन किया मिक्स्ड ग़ज़लों की सीडी थी , दो तीन ग़ज़ले निकली होंगी की मेहंदी हसन साहिब की दिलकश मखमली आवाज़ मे बीसियों साल पुरानी मेरी पसंदीदा ग़ज़ल अहमद फ़राज़ कृत

'रंजिश ही सही , दिल ही दुखने के लिये आ' ’
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ'

बजने लगी , यह ग़ज़ल मैने अब तक ज़्यादा नही तो भी पचासियों बार सुनी होगी ,

कुछ तो मेरे पिंदारे मोहब्बत का भ्रम रख ,
तू मुझ से खफ़ा है तो ज़माने के लिऐ आ

(पिंदारे : self esteem
At least have some consideration of my esteem my pride , even if you are annoyed with me , even than come due to social obligations.)

जैसे ही गज़ल का यह शेर बजा , एक बिजली सी कौंधी दिल में , यही हो रहा है माँ के साथ , यही हो रहा है माँ के साथ , बस यही हो रहा है , मसले का हल मिलता दिखाई दिया , अब तक ट्रैफिक जाम में धीरे धीरे से कार आगे बढ़ रही थी , पर अब प्राथमिकता इस जवलंत मसले का हल ढूंढ़ना था , मैने कार को जग़ह देख के साइड लगाया , गज़ल को ध्यानपूर्वक फ़िर सुना ,  बीसियों साल मे पहली बार समझ आयी इस ग़ज़ल की बुलंदी ,

इस ग़ज़ल मे शायर अहमद फ़राज़ ने एक ख़ास मानसिक परिस्तिथियों को इस खूबसूरती से शब्दों में पिरोया है , जिसमे अकेलापन एक व्यकित्व को घेर लेता है , व्यक्ति  बिल्कुल अनजाने में इस सिंड्रोम में घिर जाता है , और दूसरे किसी भी व्यक्ति से मनमुटाव शिक़वे शिकायत इसलिये कर लेता है , कि सुलह सफ़ाई के बहाने कुछ वक्त तो और साथ व्यतीत होगा , अब मुझे सारी समस्या और हल साफ़ दिख रहे थे ।

पिछले दो महीनों से माँ के पैरों का दर्द कुछ बढ़ सा गया था, जिसकी वजह से उनका अपने कमरे से डाईनिंग टेबल तक आकर खाना लेने की हिम्मत भी कुछ टूट सी गयी थी , पहले हम सुबह का नाश्ता डाइनिंग टेबल पर साथ करते थे जिसमे कम से कम आधा घंटा साथ एन्जॉय करते थे , इस ही तरह उनका लंच डिनर भाभीजी कामिनी और बच्चों के साथ होता था , साथ बिताया समय हुआ लगभग ढाई तीन घंटे , बाकी बचे समय मे TV , किताब , इधर फ़ोन , उधर फ़ोन, बेटियां , नाती , पोते , भाई , भाभी , कहने का अर्थ सारा दिन बढ़िया गुजरता था , पर अब , नाश्ता लंच डिनर सब कमरे मे बेड पर , जिसका सीधा असर, साथ बिताते समय की ड्यूरेशन पर पड़ा जो ढाई तीन घंटे से घट कर आधा पौना घंटा रह गया , जिसका सीधा रिजल्ट था पिछले अंतरे में लिखित सिन्ड्रोम ।

सबको अनुरोध किया गया कि माँ के साथ ज़्यादा से ज़्यादा समय व्यतीत करे , सबने अपना अपना सहयोग देना शरू किया ,  देखते ही देखते वो दुःखद सिन्ड्रोम ग़ायब हो गया , उसके बाद माँ का फिर वही पुराने ख़ुशफ़हम व्यक्तित्व में वापस आ गयी ।

करीब दो साल बाद बयासी वर्ष की आयु मे , हॉस्पिटल के कमरे मे अपनी बहू , बेटी , नर्स और डॉक्टर साहिब से ख़ूब खिलखिलाते हुए बात करते हुऐ , एक शानदार स्वर्ग प्रस्थान प्राप्त किया , जाना सभी ने है , खिलखिलाते हुए शानदार पदवी के साथ , या ?

उसके बाद से आज तक अनगिनत बार फिर सुनी , वही ग़ज़ल  ’रंजिश ही सही , दिल ही दुखाने के लिये आ’ ,

शायर श्री अहमद फ़राज़ साहिब को सलाम
गायक श्री मेहँदी हसन साहिब को सलाम

कपिल जैन

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Kapil Jain
Kapulrishabh@gmail.com
Noida , U.P. , India
May 14 , 2017

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https://youtu.be/wRG2XJcmhDc

https://rekhta.org/ghazals/ranjish-hii-sahii-dil-hii-dukhaane-ke-liye-aa-ahmad-faraz-ghazals?lang=hi










Monday, May 1, 2017

Kapil Story : ’ऐसे रखेगी जैसे पिंजरे मे तोता’ Will take Care like ’Parrot in a Cage’



Kapil Story : ’ऐसे रखेगी जैसे पिंजरे मे तोता’
Will take Care like ’Parrot in a Cage’

मैं सुबह फैक्टरी जाने की जल्दी मे हबड़ तबड़ में डाईनिंग टेबल पर नाश्ते कर रहा था , तभी सीढ़ियों की घंटी बजी ,
माँ ने सीढ़ियों में झाँकते हुऐ पूछा , कौन साहब ?
 आवाज़ आयी , भाभीजी भाई साहब घर पे हैं ?
माँ ने जवाब दिया , शैलेंद्र जी , आप ऊपर आइये ना , आपके भाई साहब घर पर ही है , शैलेंद्र जी ने सीढ़ियां चढ़ते हुऐ बोले , भाभीजी आज मंदिर जी के देव दर्शन के दौरान ही विचार आया कि अपनी बड़ी बिटिया साधना के लिये आपका पुत्र कपिल बहुत ही उत्तम वर रहेगा । इसी सिलसिले मे भाई साहब से मिलने की बहुत इच्छा हुई । जैसे ही मैने यह आवाज़ सुनी , दिलोदिमाग मे एक तरंग सी उठी और पूरे ज़िस्म को पुल्कित कर गयी । मेरे लिए शादी का रिश्ता आया है , वो भी शैलेंद्र जी की लड़की साधना का , लगा लॉटरी लग गयी , शैलेंद्र जी का चाय का कारोबार था और उनका और हमारा परिवार करोल बाग के पुराने जैन ख़ानदानों में थे , उनकी दो लड़कियां बड़ी साधना और छोटी प्रज्ञा , तीसरे नंबर पर लड़का सम्यक , सारा परिवार गोरा चिटा खूबसूरत तेजस्वी और पढ़ा लिखा था ।
साधना की तो बात ही निराली थी , खूबसूरत शब्द भी उसकी शख्सियत की लिये संपुर्ण नही था , जब भी मैं उसे मंदिर जी मे देखता था , उसके बाद मुझें उसके सिवा कुछ नही दिखता था , फैक्टरी जाने की सारी हबड़ तबड़ काफूर को चुकी थी , दिल की बढी धड़कन से अगले कमरे मे पहुँचे शैलेंद्र जी और डैडी के बीच होती बातचीत सुनने की कोशिश बहुत थी, कि डैडी की आवाज़ सुनी , आओ शैलेंद्र भाई , आज कैसे रास्ता भूल गये हमारा ? दूसरी आवाज़ माँ के लिऐ थी चाय के लिये , शैलेंद्र जी ने डैडी से कहा , भाई साहब , साधना के लिऐ कपिल बाबू का रिश्ता चाह रहा हूँ , डैडी की अत्यंत खिलखिलाते हुऐ हँसने की आवाज़ आयी, बोले पहले आप बैठो तो , कुछ नाश्ता तो लो , कपिल तो अभी सिर्फ बाइस साल का है अभी से शादी की बात ? इतना सुनना था कि मेरा दिल तो धक से बैठ गया , पीछे से मेरे लिये माँ की आवाज़ आयी , जूस पूरा खत्म करना ? और कुछ चाहिये , फैक्टरी पहुँच के फ़ोन करना , मतलब साफ था कि अब रुको मत और फैक्टरी पहुँचो ।
करोल बाग से ओखला फैक्टरी का सफ़र करीब बीस किलोमीटर का था जिसमे करीब पैंतालिस मिनट लगते थे , बात सन उन्नीस सौ नब्बे की है , मोबाइल फ़ोन भी नही होते थे , पूरा सफ़र बहुत बैचैनी भरा था , डैडी ने यह क्या कहा कि सिर्फ बाइस साल का है , इतना अच्छा रिश्ता भी कोई जाने देता है क्या ? इस दुनिया मे अपने माता पिता ही काम बिगाड़ने वाले हो तो ? ना कहने से पहले पूछते तो ? हज़ारों लाखों सवाल , माँ पिताजी के लिऐ गिले शिक़वे , और ना जाने क्या क्या ? भगवान करे डैडी यह रिश्ता मान लें
फैक्टरी पहुँच कर भी पाया दिल तो घर पर ही था , अभी पौने दस बजे थे , किसी काम मे कोई मन नही लग रहा था , बार बार फ़ोन का रिसीवर उठता माँ से बात करने को , पर नही , जाने इस बैचैनी को क्या कहिये ?
प्रतिदिन माँ का दोपहर दो बजे के करीब फ़ोन आता था कि लंच खा लिया या नही ? खाना ठीक लगा या नही ? आज क्या हुआ , सवा दो बज चुके थे माँ का कोई फ़ोन नही , अब तो मुझसे रहा है नही गया , माँ से बात करने के लिऐ आज तक कभी कुछ सोचा ही नही था जितना आज ,
मैने फ़ोन मिलाया माँ ने उठाया , माँ टिन्डे की सब्ज़ी टिफन में मत दिया करो , मैने आपको पहले भी मना किया है आप मानते नही हो , आज लंच बिल्कुल मजेदार नही था , जवाब आया ठीक है , कल से ख़याल करूँगी पर बेटे भिंडी थी , दाल थी , वो तो तुझे पसंद है , कोई बात नही कल से टिन्डे नही दूंगी , फिर भी बेटे , सभी सब्जियां खानी चाहिये , आदत डालो , और कोई बात , बोली ठीक है फ़ोन रखती हूं और फ़ोन बंद , और दिल की उधेड़बुन वही की वही.
दो मिनट भी नही बीते होंगे , घंटी बजी , माँ थी लाईन पर बोली , पता है आज सुबह तेरे लिए शैलेंद्र भाई साहिब जी अपनी बेटी साधना का रिश्ता लाये थे , तेरी तो बहुत ही तारीफ कर रहे थे , तेरे डैडी को बोले कि आपके परिवार को बहुत ही पसंद करते है , तेरे डैडी ने उनका धन्यवाद करते हुए कहा की आपने हमारे बारे मे इतनी अच्छी राय रखी है कि आप रिश्ता ले कर आये , परन्तु मेरी मज़बूरी यह है कि अभी कपिल सिर्फ बाइस साल का है अभी अभी छः महीने से ही फैक्टरी जाना शुरू किया है क्योंकि अभी जनवरी मे ही मुझे हार्ट अटैक आया था डॉक्टर साहब ने अभी एक महीना और आराम के लिए कहा है इसलिये कपिल ही फैक्टरी संभाल रहा है, और काफी अच्छी तरह संभाल रहा है , एक दो साल जरा आपने पैरों पर ढंग से खड़े हो जाये फिर ही शादी की विषय मे विचार करेंगे ।
माँ ने अपनी बात खत्म की और तुरंत मेरी चुप्पि से मेरे मन की सारी उधेड़बुन को समझते हुए कहा , मुझे पता है तुझे बुरा लगा , फिर भी अभी तेरे डैडी की तबियत और संभालते ही बात आगे बढ़ाऊंगी ।
समय को मेरे लिये कुछ बेहतर ही मंजूर था , अनमने ढंग से बढ़ते बढ़ते , मैंने काम मे अपने आप को ढाल ही लिया , डैडी की तबियत कोई दिन सही , कोई दिन खराब , जुलाई मे डैडी का देहांत हो गया , उसके बाद का समय काफी तकलीफ देय रहा , बड़े भाई साहिब ने सारे परिवार को संभाला , कारोबार को संभाला , मैने फैक्टरी पूरे तन मन से संभाली , एक डेढ साल मे बाकी सब चीजे तो काबू आ गयी सिर्फ डैडी की अविश्वसनीय कमी जो आज तक है ।
एक दिन शाम घर वापस आया तो टेबल पर साधना की शादी का कार्ड देखा , मुझे तो कोई बुरा नही लगा क्योंकि एक सरसरी सी आग को लगातार हवा देकर जिंदा रखना कोई आसान काम नही , बल्कि नामुमकिंन है , और बड़ी लकीरों का खिंच जाना भी एक वज़ह होता है ,यहाँ तो डैडी का ही बीच से चला जाना था इससे बड़ा क्या हादसा होता ।
उस दिन माँ ने मुझसे सीधे आँख बात नही की , सारी बात भाँपते हुऐ मैं भी वहाँ से हट गया , माँ को भी कोई अपराधबोध भावना मे देख सकता हैं कोई ?
मैं शुरू से ही स्कूल इत्यादि में मेधावी छात्रों में रहा तो एक गुरुर या मग़रूर मुझमे आ गया था , जो मर्ज़ी कहिये मैं अपने आपको ज़मीन से सात इंच ऊपर तैरता सा चलता महसूस करता था जबकि सालों बाद हकीकत से रूबरू हुआ , की शक़्ल सूरत से बेकार , गेहुआँ स्याह रंग , पतला दुबला , सादा से चेहरे पर बड़ी बड़ी आँखे , कुल मिला कर ज़िन्दगी में कभी किसी को अपनी सूरत से आकर्षित नही किया ।
करीब उम्र चौबीस की रही होगी , उन दिनों जैसे ऊपर लिखा वो मग़रूर वाला , ज़मीन से सात इंच ऊपर तैरने वाला दिल दिमाग़ था , जिसके अनुसार रिश्ते में हमे पसंद आएगी लडक़ी तो हम हाँ करेंगे वरना रिजेक्ट , लडक़ी के पास हमे रिजेक्ट करनी की कोई पॉवर नही है , हम तो थे ही सुर्खाब के परौ से सजे हुऐ , संयुक्त राष्ट्र संघ हो या अमेरिका या सोवियत रूस , इंडिया तो अपना था ही , कोई बड़े से बड़ा नेता अपने एक हाथ की दूरी से बाहर नही था ,
और फिल्मों के अभिनेता इत्यादि तो निम्न स्तर का विषय था , इसलिए लडक़ी को विश्व स्तरीय विषयों की जानकारी होगी तो अपनी पटरी बैठेगी अन्यथा रिजेक्ट , वैसे साधना का तो सौंदर्य ही राजसी था अतः उसको इन विश्व स्तरीय विषयों की जानकारी नही भी होती तो भी कोई बात नही थी ।
शादी के रिश्ते आने शुरू हुए , बड़े भाई साहब और माँ ने बहुत संजीदगी से विचार करने शुरू किए , कोई रिश्ता साधना जैसा ना आया , या हमे नही दिखा जैसे आँखों पे साधना की ही पट्टी बँधी थी , आधे से ज़्यादा रिश्ते तो मिलने से पहले स्तर पर ही खत्म , कुछ लड़कियों को हमने रिजेक्ट किया अपने विश्व स्तरीय प्रश्नों की जानकारी के अभाव मे , साथ ही करीब दस लड़कियों ने मुझे रिजेक्ट किया इन फ़िज़ूल सवालों के वजह से , एक बार तो लड़की के घर देखने उनको देखने गए तो मुझसे मिलकर वो गयी और दूसरे कमरे में अपनी बहन से बोली , इसकी शक्ल देखो और इसके प्रश्न ।
इन दस एक लड़कियों के रिजेक्शन का असर यह हुआ कि जो मे ज़मीन से सात इंच ऊपर तैरता था अब दिमाग़ से ग़ुरूर मग़रूर सब काफूर हो चुका था , अब पैर जमीन पर थे , आईने मे अपनी असली बेरंग शक्ल साफ दिखाई दे रही थी । इस ही दौरान डैडी के बाद रुपया जो पहले पेड़ पर उगता दिखता था सड़क की धूल में एक एक पैसे की बटोर की मेहनत और सौ पैसे का एक रुपया पता चला ।
अब कभी भी रिश्ते की कोई नई बात चलती तो दिल की धड़कन में कोई घटत बढत नही होती थी , सब रूटीन जैसा लगता था , कोई ख़ुशी कोई ग़म कुछ नही । फिर मेरठ मे एक रिश्ता हुआ , न जाने क्यों टूट गया , यह भी उनकी तरफ से , शायद मेरी नियति को कुछ शानदार ही मंजूर था।
हमारे एक व्यापारी डीलर श्री नानक रोहिरा साहिब , मुझे बहुत प्यार सम्मान देते थे , बोले कपिल मैने तेरे लिए एक लड़की देख रखी है तेरी शादी तो मैं कराऊंगा , तब तक मैं भी रिश्तों की बातों का आदी हो चुका था , उन्होंने बड़े भाई साहब से बात की , बड़े भाई साहब के पास कामिनी नाम की लड़की की जन्मपत्री भेजी , उन दिनों हमारे एक दूसरे सप्लायर नाथ साहब ने कंप्यूटर पर जन्मपत्री मिलाने का काम शुरू किया था , भाई साहब ने उनके पास कामिनी और मेरी जन्मपत्री मिलने के लिये भेजी , शाम हुई तो देखा की नाथ साहब पंद्रह बीस पेज का एक प्रिंटआउट लेकर आये और बड़े भाई साहब को बोले कमाल का रिश्ता है यह छत्तीस गुण मिले हैं , यह रिश्ता छोड़ना मत । उनकी आवाज़ और बात में ना जाने क्या जादू था और नानक रोहिरा साहब की बात पर उन्हें बेहद यकीन , तुरंत इधर फ़ोन और उधर फ़ोन , पता चला मेरी सगी बड़ी बहन रीता दीदी की पहचान लडक़ी की माँ से है , एक डेट तय हुई लड़की देखने के लिये ।
हमारे घर मे एक पंड़ित जी आते थे जो हमारी सारी रिश्तेदारी मे आते जाते थे , लगभग उस समय के फेसबुक थे , उनको सब ’मौसी वाले पंड़ित जी ’ कहते थे , जन्मपत्री मिलाना , रिश्ते बताना , अच्छा बुरा वक्त बताना , काम बनाना , काम बिगाड़ना , सब उनका हुनर था ।
उस दिन पंड़ित जी आये मेरे लिये एक रिश्ता लेकर , मेरी माँ को बोले बहनजी बहुत ही अच्छा रिश्ता लाया हूं तय हुआ तो मोटी दक्षिणा लूँगा , माँ बोली बहुत अच्छा पर अभी एक बहुत ही अच्छा रिश्ता नानक साहब ने बताया है और अगले इतवार लड़की देखने जाना है , कंप्यूटर की जन्मपत्री की मिलाई की बात माँ ने गोल कर दी , पंड़ित जी का मूड़ कुछ ख़राब सा हो गया , उनका लाया रिश्ता होता तो दक्षिणा भी बढ़िया होती , बारहाल उन्होंने माँ की दी हुई कामिनी और मेरी जन्मपत्री मिलाई , बोले बहनजी पत्री तो ठीक ही मिली है छत्तीस गुण मिले है , माँ ने मन सोचा वाह कंप्यूटर ने भी छत्तीस गुण ही मिलाये थे , फिर बोली पंड़ित जी यह ’ठीक ही’ मिली है का क्या अर्थ , यह जो ठीक शब्द के साथ ही क्यों बोला आपने ? क्या कोई बात है , कामिनी कपिल को ज़िंदगी भर ठीक को रखेंगी या नही ?
पंड़ित जी का जवाब आया , जी बिल्कुल ऐसे रखेगी जैसे
' पिंजरे मे तोता '
आज हमारी शादी को लगभग पच्चीस साल होने को आये ,
आज अगर वो मौसी वाले पंड़ित जी कही मिल जाये तो चरणों को हाथ लगाकर पता करूँगा , इतनी एक्यूरेसी का राज ।
कपिल जैन with Kamini
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Kapil Jain
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April 30 , 2017
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