Sunday, December 11, 2016

ज़िन्दगानी , बुलबुला और हम


ज़िन्दगानी , बुलबुला और हम
                         ... by Kapil Jain
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लाखों लहरों पे झूमती ज़िन्दगानी ,
मस्त हिचकोलो पे थिरकती ज़िन्दगानी ,

हर लहर जैसे कह रही हो ,
’ऐ ज़िंदगी’ तू तो है  फ़ानी ,

हर इक बुलबुले से नयी कहानी ,
गोल मटोल सतरँगी चमकदार ,
मुस्कुराता इठलाता इतराता बलखाता

अल्हड़ हिचकोलों को ही झूला बनाता ,
जादूई छड़ी से नित नऐ बुलबुले सजाता

जिंदगी की बुनियाद , एक बुलबुला ,
वजूद की बुनियाद , एक बुलबुला

किससे डरे हम ?
क्यूँ डरे हम ?
किसी भी पल क्या होगा ?
पैरो तले क्षणभंगुर बुलबुला ?
क्या बुलबुला फूट जायेगा ?

अगले पल मे , इस पल से ज़्यादा ख़ुशी है क्या ?
अगले पल की बेवज़ह चिंता मे क्यूँ घुले हम ?
जब तक जीये , हर लम्हें का मज़ा क्यूँ न ले हम ?

सफ़र का लुत्फ़ , मंज़िल तक रवानी ,
अगले पल का सफ़र ही है ज़िन्दगानी

मुड़कर देखा , तो साहिल पर खड़ी मेरी ’कामिनी’
मेरे इंतज़ार मे , यही तो है मेरी फकत ज़िन्दगानी

लाखों लहरों पे झूमती ज़िन्दगानी ,
मस्त हिचकोलो पे थिरकती ज़िन्दगानी .....

                                             ....  कपिल जैन

फ़ानी : mortal , perishable
रवानी : fluency of life
कामिनी : beautiful girl
फकत : only one
ज़िन्दगानी : life
बुलबुला : bubble ;  vibrancy of life

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©®℗
Kapil Jain,
Kapilrishabh@gmail.com
December 10, 2016
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"Boy Blowing Soap Bubbles,
Allegory on the Transitoriness & the Brevity of Life",  1663

Painting by Karel Dujardin, 
Dutch,  1626 - 1678

Allegory : A story, poem, or picture which can be interpreted to reveal a hidden meaning.

Transitory : lasting only a short time ;  brief ; short-lived ; temporary.

Brevity : Shortness of time.

Monday, December 5, 2016

Sochta Hoon Agar Main Dua Mangta

Kapil Jain's Understanding of "Relationships between Beloved & God",
Through the Song from Movie 'Bobby'
”सोचता हूँ अगर मैं दुआ मांगता ?
”Sochta Hoon Agar Main Dua Mangta
By Shri Anand Bakshi Ji.

फिल्म Bobby, 1973 मे रिलीज़ हुई , उसमें एक गाना
'मैं शायर तो नहीं  , मगर ऐ हसीं ,जब से देखा '
हम सबने अनेकों  बार सुना है , स्वर्गीय श्री आनंद बक्शी साहिब गीतकार का लिखा यह तराने मे एक अंतरा है
”सोचता हूँ अगर मैं दुआ मांगता ?
जिसने मेरा मंदिर मे जाकर भगवान की प्रतिमा के दर्शन के दौरान दिल मे उमड़ते भावों का संपूर्ण रूप प्रभावित किया है ,
गाने का अंतरा की पंक्तियां कुछ यूँ हैं

”सोचता हूँ अगर मैं दुआ मांगता ?
हाथ अपने उठाकर मैं क्या मांगता ?
जब से तुझसे मोहब्बत मैं करने लगा,
तब से जैसे इबादत मैं करने लगा,
मैं काफिर तो नहीं  , मगर ऐ हसीं
जब से देखा मैंने तुझको,
मुझको बंदगी आ गयी ।”

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पृष्ठभूमि शुरू :
बात आगे बढ़ाने से पहले , कुछ पृष्ठभूमि पहलूँ को साफ़ कर लेते है। सिर्फ अपने अनुभव से , किसी और का अनुभव भिन्न हो , स्वभाविक है । मेरा यह अनुभव प्राथमिक रूप से जैन मंदिर एवं जैन तीर्थकर की अत्यंत जीवंत साक्षात प्राण सजीव रूप से है , दूसरे शब्दों में पत्थर, पत्थर रहा ही नही , सजीव बल्कि साक्षात् तीर्थंकर के तेजस्वी रूप का अनुभव हुए ।

संसार भर के मूर्तिपूजक समाज मे , शिल्पकार एक पत्थर की शिला ( जैसे संगेमरमर इत्यादि की ) लेकर अपने औजार जैसे छेनी हथौड़ी से , एक प्रचलित मान्यता और शास्त्रो ग्रंथों एवम साहित्यिक कृतियों मे विवरण इत्यादि से उपजी छवि को पत्थर से एक साकार मूर्त रूप प्रदान करता है जिसे मूर्ति कहा जाता है । अगर मिसाल के लिये , भगवान महावीर का निर्वाण हुए अनुमानित 2600 साल हुए और निर्वाण भूमि पावापुरी जी , ओर एक प्रतिमा अगर अनुमानित 1000 साल पहले बनाई गयी है स्थान दक्षिण भारत सुदूर मे , तो यह जो 1600 साल और स्थान का 1200 किलोमीटर का जो फर्क है , तो स्वभाविक प्रश्न ये है कि तीर्थंकर जो किसी ने तपस्या लीन देखा , उसने विवरण को लिखा , जाहिर सी बात है , जिसने लिखा वो ही शिल्पकार जो यह बहुत कम सम्भावना है , अतः यह बात तय मानिये की विवरण को लिखने वाला और शिल्पकार दो अलग अलग शख्सियत है ।

अतः वह ग्रंथ ( ग्रंथों ) जिसमे तीर्थकर के तेजस्वी रूपो का व्याख्यान है वह आधारभूत ज्ञान है ।

पत्थर को तराश कर बनी मूर्ति
मूर्ति की प्राणं प्रतिष्ठा हुई , स्वरूप बदला , हुई प्रतिमा ।
जैन धर्म मे प्राणं प्रतिष्ठा की प्रक्रिया को पंच कल्याणक महोत्सव के नाम से जाना जाता है ।
प्रतिमा मंदिर मे सुशोभित हुई ।
आपने हमने दर्शन किये ।
क्या भगवान के तेज़ का अनुभव हुआ ?
यही है मूल प्रश्न ।

यह सब तब्दीली तो हमारे दिल के अंदर है , बाहर तो शुरू से आख़िर तक एक पत्थर की मूर्ति , मानो तो भगवान ना मानो तो पत्थर ।

पृष्ठभूमि ख़त्म ।
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वापस लौटते है फिल्म बॉबी के गाने पर

”सोचता हूँ अगर मैं दुआ मांगता ?
हाथ अपने उठाकर मैं क्या मांगता ?
जब से तुझसे मोहब्बत मैं करने लगा,
तब से जैसे इबादत मैं करने लगा,
मैं काफिर तो नहीं  , मगर ऐ हसीं
जब से देखा मैंने तुझको,
मुझको बंदगी आ गयी ।”

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”सोचता हूँ अगर मैं दुआ मांगता ?
Let me think if I pray then what for ?

हाथ अपने उठाकर मैं क्या मांगता ?
In prayer , raising hands towards lord then what for ?

जब से तुझसे मोहब्बत मैं करने लगा,
The moment , I start loving you my beloved .

तब से जैसे इबादत मैं करने लगा,
Same moment as if I started Worshipping,

मैं काफिर तो नहीं  , मगर ऐ हसीं,
I am not a Infidel , Oh my beloved beauty ,

जब से देखा मैंने तुझको,
The moment , I saw you ,

मुझको बंदगी आ गयी ।”
That very moment , I understand Devotion.

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सारांश :
चाहे आप किसी मूर्ति मे , प्रतिमा मे , भगवान ढूंढ़िए या पाइये , चाहे किताब मे , चाहे उस 'लौ' मे जो अदृश्य हो कर भी मौजूद है , बाहर कही नही है , अंदर दिल और दिमाग़ मे है , ( Discover within your self ).

यहाँ दिलरुबा महबूबा एक रूपक ( Metaphor ) है , महबूबा से मोहब्बत पहली कड़ी , पहली सीढ़ी है , आपको ख़ुदा तक पहुचाने के  लिये । शिल्पकार की उसी व्याख्या की तरह जो उसने शब्द से मूर्ति के रूपक तक अस्तित्व मे आयी । छोटे से छोटे जीवों से लेकर प्राणः संवेदन से मोहब्बत ही,  मेहबूबा से मोहब्बत का प्रारूप है और ' जिओ और जीनों दो ’ का ज्ञान    केंद्र बिंदु ।

यह मेरा निजी अनुभव है ।
किसी और का भी यही हो ,जरूरी नही ।
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©®℗
Kapil Jain,
Kapilrishabh@gmail.com
Noida , December 4 , 2016.






Tuesday, November 29, 2016

Fidel Castro's letter to US President Roosevelt : For $10 Bill.

Kapil Jain's Educational series 29A
On Fidel Castro's life aspect , Part one : Teenaged Castro's letter to US President Roosevelt : For $10 Bill.

Birth : August 13 , 1926,
This letter date : November, 1940,
Start of Revolutions Against US backed Cuban President Fulgencio Batista : 1953.

आपने गौर किया होगा की जब कोई बड़े व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है , तो टेलीविजन अखबारों में उनके जीवन वृतांत दिखाई देते है , जो उनके जीवन के बारीक़ से बारीक़ पल को किदवंती बना देते है ।

लीडर अगर विश्व स्तरीय हो तो एक बात तय है ,
या तो आप बहुत पसंद करेंगे या बहुत नापसंद ।

इसी संदर्भ मे अभी हाले ही में स्वर्ग सिधारे क्यूबा के नब्बे साल के क्रांतिकारी नेता श्री फिदेल कास्त्रो के जीवन पर एक फ्रेंच चैनल पर , एक एक घण्टे की तीन हिस्से मे आयी एक जीवनी ने उनके जीवन के कुछ पहलुओं के विषय मे जानकारी दी जो मुझे बहुत क़माल कि थी , करीब पांच छः बार मे इसके बारे मे लिखूंगा। फ्रेंच चैनल से मिले जानकारी के सिरे से , इंटरनेट से मिली जानकारी के लिंक भी शेयर करूँगा , ताकि अगर आपकी दिलचस्पी आगे हो के लिए ।

प्रथमं पहलु :
हिन्दी का एक मुहावरा है :
’पूत के पाँव , पालने मे ही दिख जाते है’

कास्त्रो का जन्म 13 अगस्त 1926 को हुआ ,
अतः नवम्बर 1940 मे आपकी आयु 14 साल की हुई ।
आपने 14 साल की आयु मे अपने देश से सिर्फ 80 मील की दूरी पर मौजूद अमेरिका के राष्ट्रपति फ्रेंक्लिन रूसवेल्ट साहिब को एक तीन पेज की चिठ्ठी लिखी ,  जबकि कास्त्रो ने चिठ्ठी मे अपने आप को 12 साल गलती से लिखा , और सिर्फ 27 साल की उम्र मे 1953 मे आपने उसी अमेरिका की बर्बादी का ताउम्र ख़्वाब लिए क्राँति की शुरुवात की ।

यह चिठ्ठी 1977 मे अमेरिका की National Archives and Records Administration ने खोजे।

चिठ्ठी की transcript और तीन ओरिजिनल पेज नीचे देखे ।
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Santiago de Cuba.
Nov 6 1940

Mr Franklin Roosvelt,
President of the United States.

My good friend Roosvelt ,
I don't know very English, but I know as much as write to you.

I like to hear the radio, and I am very happy, because I heard in it,
that you will be President for a new (periodo).
I am twelve years old. I am a boy but I think very much, but I do not think that I am writing to the President of the United States.
If you like, give me a ten dollars bill green american, in the letter, because never, I have not seen a ten dollars bill green american and I would like to have one of them.

My address is: 
  Sr Fidel Castro
  Colegio de Dolores
  Santiago de Cuba
  Oriente Cuba

I don't know very English but I know very much Spanish and I suppose you don't know very Spanish but you know very English because you are American but I am not American.

(Thank you very much)
Good by. Your friend,
Signature
Fidel Castro

If you want iron to make your sheaps ships I will show to you the bigest (minas) of iron of the land. They are in Mayari Oriente Cuba.

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©®℗
Kapil Jain,
Kapilrishabh@gmail.com
Noida , November 29 , 2016.

Thursday, November 24, 2016

Dayam Pada Hua

Kapil Jain's Understanding of
Mirza Ghalib's Ghazal
"Dayam Pada Hua,  Tere Dar Par Nahi Hu May"

"दाइम  पड़ा  हुआ,  तेरे  दर  पर  नहीं  हूँ  मैं"
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दाइम  पड़ा  हुआ,  तेरे  दर  पर  नहीं  हूँ  मैं ,
ख़ाक ऐसी  ज़िंदगी  पे , के पत्थर नहीं  हूँ  मैं

क्यूँ  'गर्दिश-ए-मुदाम' से घबरा न जाए दिल ,
इंसान हूँ , ’प्याला-ओ-सागर' नहीं  हूँ  मैं

या-रब ! ज़माना मुझ को , मिटाता है किस लिए ?
’लौह-ए- जहाँ'  पे , ’हर्फ़-ए-मुक़र्रर’  नहीं  हूँ  मैं

हद  चाहिए  सज़ा  में ,  उक़ूबत  के  वास्ते !
आखिर  गुनाहगार  हूँ , काफिर नहीं  हूँ  मैं

किस वास्ते  अज़ीज़ नहीं जानते  मुझे ?
’लाल-ओ-ज़ुमुर्रुद-ओ-जर-ओ-गौहर’ नही  हूँ  मैं

रखते  हो तुम  क़दम , मेरी  आँखों  से  क्यूँ  दरेग़ ?
रूतबे  में 'महर-ओ-माह' से कम-तर नहीं  हूँ  मैं

करते हो मुझ को 'मना -ए- क़दम - बोस' किस लिए ?
क्या आसमान  के  भी  बराबर  नहीं  हूँ   मैं

'ग़ालिब'  ’वज़ीफ़ा-ख़्वार’  हो , दो शाह को  दुआ
वो  दिन  गए , कि  कहते  थे , नौकर नहीं  हूँ  मैं


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दाइम  पड़ा  हुआ,  तेरे  दर  पर  नहीं  हूँ  मैं ,
ख़ाक ऐसी  ज़िंदगी  पे , के पत्थर नहीं  हूँ  मैं

दाइम : eternal : existing forever
दर : Door, Entrance
ख़ाक : Ashes, Dust , worthless
पत्थर : Stone

Real Meaning :
I am a human with heart & mind ,
Not a heartless ( stone ) Lying at your door ( on your mercy ) , if this life is such than like ashes ( worthless )

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क्यूँ  'गर्दिश-ए-मुदाम' से घबरा न जाए दिल ,
इंसान हूँ , ’प्याला-ओ-सागर' नहीं  हूँ  मैं

क्यूँ  : why
गर्दिश : rotational movement
मुदाम : permanently
गर्दिश-ए-मुदाम : continues bad luck
प्याला : Cup
सागर : Goblet , Wine Cup
प्याला-ओ-सागर : Heartless Ideal items

Being a human , bound to fear ( worried ) with continues bad luck , not like ideal cup & kettle.

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या-रब ! ज़माना मुझ को , मिटाता है किस लिए ?
’लौह-ए- जहाँ'  पे , ’हर्फ़-ए-मुक़र्रर’  नहीं  हूँ  मैं

या-रब : Oh - God
ज़माना : era
मिटाता : wipe , erase
लौह : iron
जहाँ  :  world , earth , universe
लौह-ए- जहाँ  : world , universe ( here meaning word etched on iron plate )
हर्फ़ : Alphabet
मुक़र्रर : repeated
हर्फ़-ए-मुक़र्रर : repeated word

Oh God , why society want to erase me ,
I am a fragile soul, henceforth die down itself , not a parmanent word etched on a iron plate to be fixed for centuries. ( Like History Books )

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हद  चाहिए  सज़ा  में ,  उक़ूबत  के  वास्ते !
आखिर  गुनाहगार  हूँ , काफिर नहीं  हूँ  मैं

हद  : boundary , limit
सज़ा : punishment
उक़ूबत : persecution
गुनाहगार : guilty
काफिर : Infidel ( here meaning : ultimate crime )

Here Ghalib has Cautioned the Civilizations about the misuse of powers by ruling elite in their waisted intrest.

I understand , to maintain civility in society , proper due persecution required for guilty within limits of prescribed Laws , henceforth here I am merely guilty ( not murderer like criminal who deserve ultimate punishment of hanging ).

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किस वास्ते  अज़ीज़ नहीं जानते  मुझे ?
’लाल-ओ-ज़ुमुर्रुद-ओ-जर-ओ-गौहर’ नही  हूँ  मैं

किस : why , which , whom
वास्ते : for the sake of
अज़ीज़ : dear
लाल : ruby
ज़ुमुर्रुद : emerald
जर : gold , money , wealth
गौहर : pearl
लाल-ओ-ज़ुमुर्रुद-ओ-जर-ओ-गौहर : variety of precious stone

This a satire on the society by Ghalib, means society care only for those , which are materialistically valuable.

I am a ordinary man ,
That's why my favorite people admire me,
I am not precious or valuable or a wealthy person like ruby , emerald , gold or pearl.

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रखते  हो तुम  क़दम , मेरी  आँखों  से  क्यूँ  दरेग़ ?
रूतबे  में 'महर-ओ-माह' से कम-तर नहीं  हूँ  मैं

क़दम : footstep
दरेग़ : hesitations
रूतबे : status , rank , dignity
महर : scholarship , 2nd : Sun
माह : monthly , 2nd : moon
महर-ओ-माह :
1. scholarship of a month
2. Sun and Moon

Literally two Meaning can be extracted out of this couplet :
First :
Why you try to avoid me as I am inferior to you , in status I am as bright and beautiful as sun and moon.
Second :
Why you try to avoid me as I am inferior to you , in Rank , my scholarship per month is not less than you.

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करते हो मुझ को 'मना-ए-क़दम-बोस' किस लिए ?
क्या आसमान  के  भी  बराबर  नहीं  हूँ   मैं

मना : forbidden , banned
क़दम : feet
बोस : kiss
मना-ए-क़दम-बोस : forbidden to kiss feet
Ghalib has derived this couplet from a Hindi Proverb which said
आसमान कदम चूमेगा ( कामयाबी की हद )

Please don't under estimate me ,
I will succeed that skies will be on my feet.

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'ग़ालिब'  ’वज़ीफ़ा-ख़्वार’  हो , दो शाह को  दुआ
वो  दिन  गए , कि  कहते  थे , नौकर नहीं  हूँ  मैं

ग़ालिब : Poet 'Mirza Ghalib' referring himself
वज़ीफ़ा : scholarship
ख़्वार : recipient
वज़ीफ़ा-ख़्वार : scholarship recipient
शाह : monarch, king , ruler
दुआ : blessings , prayers , wish

नौकर : servant

Oh Ghalib , Now as you are a scholarship recipient , Say thanks to the King for his kind blessings ,
Old bad days are over when people used to tease me as Servant , Now I'm not.


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©®
Kapil Jain
Kapilrishabh@gmail.com
Noida,  November 24, 2016

Wednesday, November 9, 2016

"The word of Promise" on Indian Currency note

Kapil Jain's Educational Series No. 24
on "The word of Promise" on Indian Currency note,  Nov,  9,  2016

The Promise was on
Indian Currency note till 1967 since British Raj times.

"I promise to pay the bearer on demand The sum of one hundred rupee 100
At any office of issue"

With these promise, it was illegal on part of Government to stop or to make a conditional payment against the said currency note bearing above.

In 1967,  when Late Shri Morarji Desai was finance Minister,  as country was recovering the after effect of Chinese War of 1962 thereafter, Pakistan War 1965.
Indian Government though about the eradication of Hoarding & Black Marketing.

But with the Promise stated with the words 'ON DEMAND' & 'AT ANY OFFICE OF ISSUE' , It was legally impossible to stop its legal tender ability.

Therefore in 1967,  Government removed the words 'ON DEMAND' & 'AT ANY OFFICE OF ISSUE' on the currency notes,
The Promise becomes

"I promise to pay the bearer the sum of One hundred rupee"

Means Government can impose the conditions, time frame, place of payment if any with the above promise.
Same as Hon'ble PM Shri Modi Government did on Nov 8,  2016

Any  further information on this subject,
Most welcome to update.

Thanks
Kapil Jain
Kapilrishabh@gmail.com
Nov.  9,  2016.   Noida

Sunday, October 23, 2016

"Break Down" to "Break-Down"

Kapil Jain's Story :
From "Break Down" to "Break-Down"

बात सन 1985-86 के करीब की रही होगी , दिसम्बर का आखिर या जनवरी की शुरुवात ,  कुछ अंदाज़ा ही है ,  क्योंकि उस रात बेहद सर्दी के साथ धुंद इतनी ज्यादा थी की सड़क पर दस बारह फुट से ज़्यादा नहीं दिख रहा था ।

उस रात , गाड़ी चलाना बहुत ही ज़ोखिम भरा काम था ,
उन दिनों आज की तरह मोबाइल फ़ोन नहीं होते थे।

लगभग रात के नो बजे होंगे , पिताजी ओखला से करोल बाग़ , घर अभी तक नहीं पहुँचे थे , आप अमुमन शाम छः बजे तक आ जाते थे , परिवार के सभी सदस्य अत्यंत गहन चिंता में थे । ओखला मे फैक्ट्री की बिल्डिंग का निर्माण प्रगति पर था ,  फ़ोन मिलाने पर वहाँ का टेलीफोन लगातार बज रहा था , कोई उठा नहीं रहा था , शायद चौकीदार इधर उधर खाना वाना खाने चला गया होगा ?

कुल मिलाकर, सारी परिस्थियों ने चिंता को असहनीय बना दिया , हम दोनों भाइयो ने अपने टू व्हीलर स्कूटर से ओखला जाना का निर्णय लिया जो करीब बीस किलोमीटर है  , बड़े भाई साहिब का अंदाज़ा था कि हमारी अम्बेस्डर कार कही रास्ते मे खराब हो गयी है , जिसकी वजह से पिताजी अभी तक घर नहीं पंहुचे , स्कूटर मै चला रहा था और पीछे भाई कार को तलाशने की कोशिश में थे। धुंद इतनी ज़्यादा थी की स्कूटर चलाना और देखना अपने आप मे एक चैलेन्ज था ।

धीरे धीरे ओखला की तरफ बढ़ते हुए करीब एक धंटे के बाद ग्रेटर कैलाश के करीब मे कार दिखी , जान मे जान आयी , पिताजी और ड्राइवर भुवन सिंग दोनों मिले , पता चला की अम्बेस्डर कार के कार्बुटर में कुछ कचरा था , पिताजी ने बताया कि फैक्ट्री से ही आज करीब एक घंटा देर से निकले क्योंकि ठेकेदार से हिसाब मे समय लग गया था , फिर कार ख़राब हो गयी , सड़क किनारे मेकैनिक ने भी ठीक किया , फिर भी थोड़ी दूर बाद फिर बंद हो गयी , क्योकि धुंद और ठंड भी बहुत थी , तब तक दस बज गये ।

अब दो तरीके थे , पहला की गाड़ी, वही सड़क के किनारे छोड़े और टैक्सी मे घर जाए , दूसरा गाड़ी को टैक्सी से खींच कर घर ले जाये , दूसरे मे फ़ायदा ये था कि घर पर गाड़ी जान पहचान क़े कारीगर से ठीक करवा ले और अगला दिन सब आसान हो जाये। अतः दूसरा तरीका ही तय हुआ ।

कई गाड़ियों , टेम्पो , टैक्सियों को पूछा , कोई राज़ी ही नहीं हुआ ।

इसी बीच एक टैक्सी वाले ने बताया कि धोड़ी ही दूर पर अर्चना सिनेमा के बाहर एक टैक्सी स्टैंड है , वहां से आपको टैक्सी मिलेगी जो कार को खींच कर ले जा सकती है । मै अकेला स्कूटर पर टैक्सी स्टैंड पंहुचा , वहां एक ही टैक्सी खड़ी थी , साथ ही टेंट का तंबु था , दरवाजे पर जो पर्दा था , हटाकर अंदर देखा की ड्राइवर तंबु में रजाई मे दुपक कर सो रहा था , एक छोटा लड़का और जग रहा था । तंबू अंदर काफी गरम था तसले मे कोयले लाल जल रहे थे । मैने उससे पूछा टैक्सी ड्राइवर कौन है ? बातचीत की आवाज़ सुन , ड्राइवर ने मुँह रजाई से बाहर निकला ।

मैने ड्राइवर से कहा कि हमारी कार ”Break Down” हो गयी है, उसको खिंच कर करोल बाग ले जाना है , करीब एक मिनट के सन्नाटे के बाद वो बोला पांच सौ रूपये लगेंगे , पांच सौ रुपये ? नार्मल किराये से पांच गुना ज्यादा । भाई साहिब कुछ कम ले लो मैने पूछा ? जवाब आया पाँच सौ ही लगेंगे । मरते क्या ना करते मैने कहा ठीक है । मैने यह भी पूछ लिया की आपके पास कार खीचने की रस्सी है , वो बोला यह सब अब मुझ पर छोड़ दो , जवाब से मै भी निश्चिन्त हो गया । ड्राइवर रजाई से बाहर आया , पाजामे में था , पता नहीं क्या सूझी उसे , तम्बु का पर्दा हटा कर सर बाहर निकला , बाहर की बेहद सर्द हवा और धुंद को महसूस किया , अंदर और बाहर के तापमान के फ़र्क ने तुरंत उसकी आँखे पूरी तरह खुल दी । बोला में कपड़े पहनकर आता हूँ । मै बाहर इंतज़ार करने लगा ।  पांच मिनट बीते , आठ मिनट बीते , जब दस मिनट हुए तो मैने बैचेनी में आवाज़ देखकर पूछा भाई साहिब कहा हो ? अंदर से जवाब आता इससे पहले मैने पर्दा हटाया हो पाया, ड्राइवर रजाई के अंदर ,  बोला बहुत ही रिस्क है इसमें ,
मुझे उसकी बात समझ नहीं आयी , क्या रिस्क है मैने पूछा ? बोला कि जब आपकी गाड़ी को रस्सी से खींचूंगा तो आपकी गाड़ी , मेरी गाडी को पीछे से ठोक देगी ।
मैने पूछा , क्यूँ ठोक देगी ? मेरे भाई पीछे कार मे हमारा ड्राइवर होगा वोह कार को रोकेगा ?

जवाब आया , आपकी गाड़ी के तो Break ही Down है , आपका ड्राइवर पीछे की गाड़ी रोक ही नही सकता , वोह मेरी गाड़ी को रास्ते मे पीछे से ठोक सकता है , बहुत रिस्क है । Break ही Down है ? मुझे समझ ही नहीं आयी की इसका क्या अर्थ है ? भाई मेरी गाड़ी की Break बिलकुल ठीक है , मेरा ड्राइवर कार को Break लगायेगा और कार रुकेगी । वोह मुझसे बोला , आप ही ने तो कहा था कि कार "Break Down” है ।

मुझे सारी बात समझ मे आ गयी , तब तक मेरा दिमाग़ भी सटक चुका था । मैने झल्लाते हुए कहा कि कार "Break Down” का मतलब है कि कार खराब हो गयी है , इसका मतलब यह नहीं है कि कार की  Break Fail है ।

बाहर की कड़क ठंड , तंबू अंदर गरम रजाई
बोला मै नहीं जाऊंगा ।

हम सब जैसे तैसे घर पहुँचे ।

भाषा में सही शब्दों का चयन का मक़सद ?

"Break Down" से  ”Break-Down”
इत्यादि शब्दों का दूरी का पैमाना ( - )

Kapil Jain
9810076501
Kapilrishabh@gmail.com
Noida,  October 23, 2016

Sunday, October 9, 2016

Kapil Jain Story : Peach Seed : आड़ू का बीज

Kapil Jain Story : Peach Seed : आड़ू का बीज

आज सब्ज़ी-फल-मंडी मे एक व्यक्ति आड़ू (Peach) की ख़ोज में लगा था , आड़ू पूरी मंडी मे कही था ही नही , सभी दुकानदारो का यह कहना था कि अब आड़ू का सीजन नही है , कुछ इतेफ़ाक ऐसा हुआ उस व्यक्ति ने जब पहली दुकान से पूछा तो भी मै वही सामान खरीद रहा था , उसके बाद करीब आधा घण्टा , मै बाज़ार मे रहा , वो मुझे कई जगह दिखा , कुछ हैरान कुछ परेशान .

लगभग आखिरी दुकान की बात है ,
मै जब उस दुकान पर पहुँचा , मैने सुना ,
आड़ू है भाई साहिब ?
दुकानदार ने जवाब दिया , अभी आड़ू कही नही मिलेंगे ।  वो वापस लौटने हो हुआ ही था कि मुझसे रहा नहीं गया ,
मै उससे पूछ ही लिया , भाई साहिब आड़ू की इतनी भी क्या जरूरत हो गयी , ग्राहक मुझसे बोला  की असल मे ज़रूरत आड़ू की नहीं बल्कि उसके बीज़ की है ,
आज घर मे पूजा है और उसमे किसी विधि-विधान मे आड़ू का बीज सामग्री की तरह चाहिये ।

मेरे लिए यह एक नयी जानकारी थी , मैने अपनी ज़िन्दगी मे कभी भी आड़ू के बीज का उपयोग नहीं सुना था , वो भी पूजा मे? मैने उससे कहा , भाई साहिब , मुझे लगा की जैसे आपके बच्चे ने आज ज़िद पकड़ ली की मुझे तो आड़ू ही खाने है जिसकी वज़ह से आप इतनी मेहनत से आड़ू ढूंढ रहे है , आप पढें लिखे आदमी हो सच्चे दिल से पूजा करो , क्या फ़र्क  पड़ता है कि आड़ू का बीज़ है या नही है ? इतनी देर से परेशान हो ।

दुकानदार के पिताजी , बातचीत के दौरान ही वही पहुँचे थे,
सारी बात को सुनते ही हरक़त मे आ गए, आड़ू के बीज़ के पूजा के उपयोग की जानकारी रखते थे, अपने लड़के से तुरंत बोले की (किसी व्यक्ति का नाम लेकर ) वहाँ जा और मेरा नाम लेकर कहना की आड़ू के चार सच्चे बीज़ दे दे । और दुबारा ताक़ीद की सच्चे ही लाना ।

मेरी उत्सुकता और बढ़ चुकी थी , आड़ू के बीज वो भी सच्चे । मै भी वही इंतज़ार करने लगा । पांच मिनट के बाद, लड़का आड़ू के चार बीज़ जो पूरी तरह सूखे थे लेकर आया और ग्राहक से बोला डेढ सो रूपये ( Rs. 150) ,
चार बीज़ के लिऐ डेढ़ सौ रुपये ?

मेरे और ग्राहक के चेहरे पर यही विचार , लगा जरूरत का नाजायज़ फायदा उठा रहा है ।

तभी पिताजी ने अत्यंत झुंझलाते हुए अपने लड़के को हाथ के इशारे से रोका और जेब से एक सौ नोट निकाला और आड़ू के बीजों के ऊपर रखा , बड़े ही श्रद्धा से दोनो हाथ जोड़ें और ग्राहक की तरफ बीज और नोट देते हुए कहा , भाई साहिब , हमारी तरफ से भी यह पूजा में दान देना ,
लड़के ने सकपका के कहा : पिताजी मै इन चार सूखे बीजों के सौ रूपये असल कीमत दे कर आया हूँ , इसलिये ही डेढ़ सौ रूपये मे बेचना चाह रहा था , मैने डेढ़ सौ रूपये कोई नाजायज़ नही माँगे , आपने लगात तो छोड़ी और अपनी जेब से सौ रूपये और दे दिये । पिताजी बोले यह पूजा मे बहुत दिन से करना चाह रहा था, अब यह भाई साहिब की बदौलत हमारी भी आहूति हो जायेगी पूजा मे ।

अब बारी थी ग्राहक की , वह बोले ,
अगर मैने बीज़ के दाम नहीं दिये
तो मेरी पूजा पूरी नहीं होगी ?

मेरा हँसते हँसते बुरा हाल हो गया,
और मै वहा से निकल लिया
जाने पूजा में किसकी कितनी आहुति हुई ?

पाँच व्यक्ति : पाँच विचार

लड़का  :  पक्का व्यापारी

पिताजी :  पक्का भक़्त

ग्राहक   :  पक्का असूल पसंद

मै         :  दुनियादार , करना कराना कुछ नही ,
              दूसरों को वो सलाह
              जिसपर कभी खुद अमल नहीं

आप यानि पाठक : निर्णायक

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Kapil Jain Story : Peach Seed
Kapilrishabh@gmail.com
Noida , Oct 9 , 2016

Sunday, August 28, 2016

जब ये श्यामल संध्या रात्रि में विलीन हो जायेगी।


Classic Sensuous
Great poem

जब ये श्यामल संध्या
रात्रि में विलीन हो जायेगी।
  
नभ पर छिड़की हुई लाली
जब अंधकार में
लीन हो जायेगी ।

तब अपने कक्ष में
ऊष्मा भरे प्रेम के
दीप जलाना ।

उड़ेल देना अपने
नयनों से
स्नेह भरी मदिरा ।

और सिद्ध कर देना
इतना भी कठिन नहीं
है जीना ।

Shri Aniruddh Agarwal Bhai Sahib Ji

Sunday, July 31, 2016

"Wo Jo Hum May Tum May Karaar Tha""वो जो हम मे तुम मे करार था"By Momin Khan Momin


Kapil Jain's Understanding of Ghazal,
"Wo Jo Hum May Tum May Karaar Tha"
"वो जो हम मे तुम मे करार था"
By Momin Khan Momin
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वो जो हम में तुम में करार था ,
तुम्हें याद हो के ना याद हो..
वही यानी वादा निबाह का,
तुम्हें याद हो के ना याद हो..
वो नए गिले वो शिकायतें ,
वो मज़े मज़े की हिकायतें ,
वो हर एक बात पे रूठना ,
तुम्हें याद हो के ना याद हो...
कभी हम मे तुम मे भी चाह थी ,
कभी हम से तुम से भी राह थी ,
कभी हम भी तुम भी थे आशना ,
तुम्हें याद हो के ना याद हो...
जिसे आप गिनते थे आशना ,
जिसे आप कहते थे बा-वफ़ा,
मैं वही हूँ मोमिन-इ-मुब्तला ,
तुम्हें याद हो के ना याद हो..
वो जो लुत्फ़ मुझ पे थे पेश्तर,
वो करम के था मेरे हाल पर..
मुझे सब है याद ज़रा ज़रा
तुम्हें याद हो के ना याद हो
_____________________
वो जो हम में तुम मे करार था ,
तुम्हें याद हो के ना याद हो..
वही यानी वादा निबाह का,
तुम्हें याद हो के ना याद हो..
करार : Here meaning "Understanding"
यानी : That Is To Say
वादा : Promise
निबाह : Loyalty
In between us, 
there was an understanding, 
Do you remember or not?,
there was a promise of loyalty,
Do you remember or not?
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वो नए गिले वो शिकायतें ,
वो मज़े मज़े की हिकायतें ,
वो हर एक बात पे रूठना ,
तुम्हें याद हो के ना याद हो...
गिले : गिला : Complaint, Blame, Lamentation
शिकायत : Complaint, Accusation
हिकायत : Anecdote, Story, Narrative
रूठना : tantrums, Angry,  Annoyed
Each time,
Your new blames, Your Complaints,
Your narratives, Your tantrums,
Do you remember or not?
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कभी हम में तुम मे भी चाह थी ,
कभी हम से तुम से भी राह थी ,
कभी हम भी तुम भी थे आशना ,
तुम्हें याद हो के ना याद हो...
चाह : Affection, Liking, Love
राह : Same thinking, Path, Access, Passage
आशना : Lover, Friends, Acquaintance
At one point,
We were affectionate,
We had the same thinking, path,
We loved each other,
Do you remember or not?
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जिसे आप गिनते थे आशना ,
जिसे आप कहते थे बा-वफ़ा,
मैं वही हूँ मोमिन-इ-मुब्तला ,
तुम्हें याद हो के ना याद हो..
गिनते : गिनना : Count
बा-वफ़ा : Faithful
मोमिन : Poet : 'Momin' Khan Momin
मुब्तला : Absorbed, Embroiled In
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वो जो लुत्फ़ मुझ पे थे पेश-तर,
वो करम के था मेरे हाल पर..
मुझे सब है याद ज़रा ज़रा
तुम्हें याद हो के ना याद हो
लुत्फ़ : Joy, Pleasure, Grace, Wit
पेश-तर : Before, prior to
करम : Generosity, Kindness
मेरे हाल पर : My Condition
ज़रा : Few, Little, Just
Prior to our differences,
The joy in which we were in, was the generosity on us, I still remember few,
Do you remember or not?
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Original Source :
वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो कि न याद हो 


Saturday, July 30, 2016

मुझको यकीं है सच कहती थी जो भी अम्मी कहती थी



मुझको यकीं है सच कहती थी जो भी अम्मी कहती थी
जब मेरे बचपन के दिन थे चाँद मे परियां रहती थी

एक ये दिन जब अपनों ने भी हम से नाता तोड़ लिया
एक वो दिन जब पेड़ की शाखें बोझ हमारा सहती थी

एक ये दिन जब सारी सड़के रूठी रूठी लगती है
एक वो दिन जब आओ खेलें सारी गलियां कहती थी

एक ये दिन जब जागी रातें दीवारों को तकती है
एक वो दिन जब शामों की भी पलकें बोझिल रहती थी

एक ये दिन जब लाखों गम और काल पड़ा है आँसू का
एक वो दिन जब एक ज़रा सी बात पे नदिया बहती थी

एक ये घर जिसमे मेरा साजो समां रहता है
एक वो घर जिसमे मेरी बूढी नानी रहती थी

मुझको यकीं है सच कहती थी जो भी अम्मी कहती थी
जब मेरे बचपन के दिन थे चाँद मे परियां रहती थी

.......जावेद अख्तर


https://www.facebook.com/kapilrishabh/videos/vb.1018850660/10207418241107079/?type=2&theater

Monday, May 30, 2016

मॉर्निंग वॉकर्स की किस्में .....कपिल जैन



मॉर्निंग वॉकर्स की किस्में
            .....कपिल जैन
नॉएडा आने से पहले हम दिल्ली करोल बाग़ में रहते थे, अतः मॉर्निंग वाक के लिए ’बुद्ध जयंती पार्क’ जाया करते थे और सन्  2004 में नॉएडा सेक्टर44  मे आने के बाद तो सी ब्लाक फाउंटेन पार्क जिंदाबाद । करोल बाग़ के नज़दीक और सबसे अच्छा बड़ा साफ़ सुथरा पार्क ’बुद्ध जयंती पार्क’ है , जो सन् 1964 में भगवान बुद्ध के 2500 निर्वाण महोत्सव के रूप में जापानी सहयोग से बना , सन् 1993 मे दलाई लामा साहिब के सानिध्य मे भगवान बुद्ध की एक सुनहरे रंग की बेहतरीन गरिमापूर्ण प्रतिमा स्थापित हुई ।
यहाँ चर्चा का विषय "बुद्ध जयंती पार्क" से लेकर सेक्टर44 के पार्कों मे आने वाले मॉर्निंग वॉकर्स की विविध किस्मों के सन्दर्भ में मेरी अपनी ऑब्जरवेशन है , मै ग़लत भी हो सकता हूँ , अतः कोई बात बुरी लगे तो माफ़ी दीजिये ।
मोर्किंग वॉकर्स में प्रमुखतः दो किस्मे पायीं जातीं हैं
पहली किस्म : उठे हुए कहिए या दीवाने
दूसरी किस्म  : धकेले हुए
पहली किस्म : उठे हुए कहिए या दीवाने की शान मे ’शकील बदायूँनी’ का यह शेर
कुछ कम ही ताल्लुक़ है मोहब्बत का जूनून से,
दीवाने तो होते ही है बनाये नहीं जाते...
दीवानेपने की हद आप खुद ही सोचिये , एक धुंध भरी सर्द सुबह हो और रज़ाई से निकलना तो दूर , हाथ बाहर करने का भी दिल ना चाहे , इस स्थिति के बावजूद कोई टोपी मफलर दस्ताने पहने मॉर्निंग वाक के लिए प्रतिदिन पहुंचे और साथ यह भी कहे, ’यारो वाक करने का मज़ा तो सर्दियों में ही है’ , इस स्थिति  में कोई रज़ाई से पार्क पहुंचे , तो वह बौद्धिक स्तर पर भी तो उठ ही गए , उन्होंने नींद की गुलामी से मुक्ति जो पा ली है , यह तो सिर्फ एक मौसम की मिसाल भर है , गर्मी हो , बरसात हो , दीवाने मॉर्निंग वॉकर्स सुबह पांच छै बजे तक पार्क पहुँच चुके होते है , उनकी सुबह-चर्या बिल्कुल सेट हो चुकी होती है , पहले वाक करेंगे योग फ़िर प्राणायाम जाने क्या क्या , जब तक बाकी दुनिया बिस्तरे से उठती है , वह पार्क से घर पहुँचकर चाय एवं न्यूज़ पेपर का मज़ा ले रहे होते है , हम कभी भूले भटके सुबह जल्दी पार्क पहुचे तो उनसे गेट पर मुलाक़ात होती जाती है , हम अंदर जा रहे होते है वो बाहर आ रहे होते है , बुद्ध पार्क में कोई दीवाना आपको दातुन, मिश्री , इलाइची , काली मिर्च इत्यादि भी गिफ्ट कर देते थे , इस हिदायत के साथ काली मिर्च सुबह सुबह आँखों के लिए बहुत मुफ़ीद है और अगर काली मिर्च चिरमिरी लगे को मिश्री भी खा लेना बहुत स्वादिष्ट लगेगा , अत्यंत खेद से कहूँ, तो नॉएडा मे इतने उठे हुए अभी नहीं है । इस किस्म का आयु वर्ग भी लगभग पैंसठ साल से ऊपर ही है । नमस्ते का जवाब भी बहुत आनन्द दायक होता है आपने कहा नमस्ते तो जवाब आयेगा ”नमस्ते जी नमस्ते प्रभु का शुक्रिया क्या मज़ा आ रहा है, मई जून की उमस भरी गर्मी में भी डायलाग वही मज़ा आ रहा है भाई पसीना निकलना भी कितना ज़रूरी है । जन्मदिन या मैरिज एनिवर्सरी की पार्टी भी देनी या लेनी नहीं भूलते , जीवन का पूरा लुल्फ़ लेते है यह उठे हुए दीवानो की किस्म।
दूसरी किस्म  : धकेले हुए का अर्थ : कोई चिंता पीठ पर धक्का मार रही है , किसकी वजह से मजबूरी मे पार्क आना  पड़ रहा है : इस किस्म के मॉर्निंग वॉकर वो होते है जिनको बुनियादी तौर से आलसी या उन्हें अपनी नींद से बहुत प्यार होता है , बिस्तर , रज़ाई या एयर कंडीशनर रूम , टीवी , लेट नाईट पार्टी , नाईट शो मूवी पोपकोर्न के साथ इत्यादि इत्यादि इनके ख़ास शौक होते है , अपनी सेहत के रख रखाव के लिए बहुत बढ़िया महँगे वाले स्पोर्ट शू और ट्रेडमिल खरीद कर भी लाएंगे वो बात अलग है की कुछ ही दिनों में उस ट्रेडमिल पर आपको कपडे सूखते दिखाई देंगे , सामान्यतः ये वजन मे भारी यानी overweight होते हैं , एक उम्र के पड़ाव तक आते आते दवाई की एक-दो गोली दिनचर्या का हिस्सा हो जाती है , डॉक्टर साहिब की हिदायत आ चुकती है की मॉर्निंग वाक 40 -45 मिनट्स की नहीं हुई , तो गड़बड़ तय है , अंदर ही अंदर खुद को भी सारी स्थिति स्पष्ट होती है, पर इस मन का क्या , एयर कंडीशनर रूम बनाम उमस भरी सुबह, गरमागर्म रज़ाई बनाम सर्द सुबह ।
यह बात तो तय है, धकेले हुए मॉर्निंग वॉकर को पार्क में आना बहुत दुश्वार लगता है , पर आने के बाद बहुत अच्छा लगता है उसके बाद सारा दिन बहुत ऊर्जावान गुजरता है
इसके बाद की क्रमवार श्रृंखला कुछ यूं है की वो 365 दिनों में एब्सेंट बहुत मारता है , जिस दिन मॉर्निंग वाक नहीं करता , दिल में सारा दिन एक गिल्ट महसूस करता है , चार पांच साल तक की एब्सेंट से भरी धक्का-शाही की आधी अधूरी मॉर्निंग वाक चलती है , इसके बाद कोई ना कोई मेडिकल रिपोर्ट मे कबाड़ हो जाता है , फिर शुरू होती है आर या पार की मॉर्निंग वाक ,  इस दौरान कोई उठा हुआ दीवाना मॉर्निंग वॉकर, आपको प्रतिदिन खींचता शुरू कर देता है , जो खुद कभी धकेला हुआ था , जो सारी स्थिति को समझता है , धीरे धीरे आप भी उठे हुऐ दीवानो की किस्म होने की तरह अग्रसर हो जाते हैं। रेगुलर पार्क जाते है । और आखिर मे धकेले हुए मॉर्निंग वॉकर की शान मे हबीब जालिब साहिब का शेर :
एक मुझे आवारा कहना , कोई बड़ा इल्ज़ाम नहीं,
दुनिया वाले दिल वालो को और बहुत कुछ कहते है....
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बायें से दायें : पहली किस्म : उठे हुए कहिए या दीवाने :
सर्वश्री सुमित बंसल जी (C-183), अशोक मेहरा जी (C-6), कौशिक जी (C-169), सुदेश जिंदल जी (C-213), सुरेंद्र गर्ग जी (C-64),  अमित बंसल जी (C-183), मनोज सचदेव जी (C-90), छाबड़ा जी (C-163), चरणजीत चड्ढा जी (B-74), मैनी जी (C-63), राज सचदेव जी (C-90), प्रमोद खन्ना जी (Kartik Kunj) , योगेश आनंद जी (C-62) , के सी शर्मा जी (C-40), सुभाष चौहान जी (C-5) , कुलदीप राणा जी (C-35), गुरदीप चढ़ा जी (C-263) प्रमोद शर्मा जी (C-89)
बैठे हुए : धकेले हुए किस्म : कपिल जैन (C-145)